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Beena Hora

पर्दों के पीछे

उन गहरे रंग के पर्दों के पीछे,
ना जाने क्या था
मेरी माँ के मन में, ना जाने क्या था
क्यों माँ उन्हें बंद रखती थी
मैं कहता था, खोलो इन्हें,
थोङी धूप, थोड़ी रोश्नी अन्दर आयेगी
माँ का जवाब कुछ यूँ होता था,
हाँ हाँ धूप तो आयेगी,
पर मेरे सुन्दर फर्निचर पे चढ़े कपड़े का रंग फीका कर जायेगी
इसी लिये ये बंद ही अच्छे हैं
घर के पुराने मेज़ों पे भी, सूर्ज की तेज़ रोशनी असर कर जायेगी
इसी लिये ये बंद ही अच्छे हैं
और शायद माँ की नज़र को, तेज़ रोशनी भाती नहीं थी
य़ह उम्र का तकाज़ा था
अब जब भी किसी घर के बंद पर्दे देखता हूँ
उन पर माँ की कही बातें दिखती हैं
माँ का घर बिक गया है, वहाँ आना जाना नहीं है
उस घर से जुड़ी यादे बहुत हैं, पर अन्दर जाने का बहाना नहीं है
मैं जब भी किसी घर के बंद पर्दे देखता हूँ
उन पर माँ की कही बातें दिखती हैं!